Wednesday, January 24, 2018

जेंव्हा इमारती समोर उभ्या असतात
आ वासून तुम्हाला गिळंकृत  करण्यसाठी,
आणि तुम्हाला जाणवत  असतो ,
गुदमरणारा  श्वास  !
छोट्याशा  खिडकीतून  वाकून  बघणारे  
चड्डी  बनियान  आणि  ब्रा,
सांगत असतात  तीच  ती  गोष्ट , 
महानगराच्या  खुजेपणाची !
आणि  तुमच्या  बाल्कनी मधली 
तजेलदार  बोगनवेल  देत  असते,  
साक्ष  तुमच्या  सुखवस्तूपणाची .
पण  रोज  रोज  कॉफी  प्यायला 
बाल्कनीत  बसायला  वेळ उरलेला  नसतो.  
आणि  खरंतर  समोरच्या  
Sra च्या  बिल्डिंग  मधून 
वाकुल्या  दाखवणारे 
चड्डी  बनियान  आणि  ब्रा, 
न पुसून  टाकता  येणारा भूतकाळ,  
तुमच्या  मेकअपचं  कोरीव  काम  केलेल्या 
आणि  परफ्युमनी  न्हायलेल्या ,
नितळ  त्वचेला  देत  असतो  तडे  !

चड्डी  बनियान  आणि  ब्रा 
या  खासगी मालमत्तेचं 
प्रदर्शन  लावल्या  बद्दल 
‘त्यांच्यावर’  गुन्हा  दाखल  करता  येणार  नाही !
मग  शोधुयात  कारणं, 
लवकर  आणि  तत्परतेने 
‘त्यांना’  इथून  हद्दपार  करण्याची.  
गावाच्या  वेशीबाहेर  राहायची ज्यांची  लायकी  
ते  कसे  उगवलेत,  
पिंपळासारखे  आपल्याच 
सैनिटेरी  पाईप  च्या  आडोशाने 
त्याचा  घेऊ  या  शोध !
मग  घेऊ  बाल्कनीत 
कॉफी  .. 
समाजातल्या  अंतहीन  
दुही  बद्दल  चर्चा  करत 



Sunday, December 3, 2017

लोग ..जो जीने के लिए करते हैं सफ़र
छोड़ कुछ बर्तन भांडे ..
और कुछ ख़ाली जगह
कुछ धूनें ,पुरानी बस्तियों जितनी
ख़ाली हाथ , कुछ अरमान
..कहीं अपना घोसला बनाने के
चल पड़ते हैं ,यूँ ही जैसे 
चलने के अलावा ना कोई चारा हो
ना कोई वजह जीने की...
चलते रहने के अलावा
और पोहोंचते है .. महानगर में ..
जो मुँह खोले बैठा है..

सुकून

गर अचानक सारी भीड़भाड़ को छोड़
दुनिया के किसी कोने में खेती करने लगूँगी
तो क्या सुकून पा लूँगी!
इसमें एक बात तो मान कर चलना होगा
के जिसे मैं खेती कहती हूँ, वो फ़ार्मिंग है!
नदी के किनारे वाली! ठंडी ठंडी हरी हरी
अब इस देश में ऐसी जमीं ख़रीदने के लिए
कितने किसानों को बेचना पड़ेगा?
और कितनों की ज़मीन NA करवानी होगी
और ऐसे जमीं पर जब मैं 
अपने किचन गार्डन के लिए 
चिलीज़ और टमेटो उगाऊँगी 
तो क्या मेरे सुकून में 
ख़ून की महक ना होगी?
या अब मेरा सुकून ...
महक और मिट्टी और ख़ून से 
बहोत दूर चला आया है

रोशनी

तुम मेरी कविताओं में 
मुझे ढूँढने की कोशिश मत करना
ना मेरी गली में इस देश को ..
अब मेरे साये के भी छिलके बचे हैं
और मेरा सूनापन क़तई रूमानी नहीं।
वो उतना ही सच्चा है,
जितनी ये दुनिया और अँधियारा
मेरे गले में और गली में है रोशनी,
निऑन साइन की जगमगाहट काम हो..
तो झाँक लो..
मेरी गली में, और कविता में 

Friday, August 25, 2017


चल तर..

चल, तुला मनाच्या अशा प्रदेशात घेऊन जाते
जिथे चकव्याला रानभूल म्हणतात !
तुझ्या शारीर मोहोराचे दरवळ
अजून ताजे आहेत माझ्या मानेवर  !

चल, माझ्याबरोबर अशा आकाशात
जिथे उडण्यासाठी पंखांची घाई नाही रे !
तुझ्या बोटावर माझ्या नखांची नक्षी
क्षितिजभर वावटळ उठवत राहील !

चल माझ्या बरोबर गाढ संवेदनेच्या
त्या अवकाशात , जिथे प्रकाशाची विवरे आहेत
तुझ्या नजरेचा फास  पडलाय आत्म्याभोवती
आणि दुखावून सुखावणारा भोवरा तुझ्या तळहातावर..
तू फक्त चल..



Sunday, August 13, 2017

बच्चे...

अंदर की बेचैनी अब 
और कितने टुकड़े करेगी 
ये समझ नही आता 
बस दर्द होता है 


ये  नन्हें पौधौं को आग लगाकर
जो धुआँ जमा होता है,
तेरे मेरे अंतरिक्ष में !
उसे निगल कर क्या, 
ऑक्सिजन की एक बूँद
 पैदा कर पाएँगे हम!
हम हो चुके हैं, मौन
दिल ऐसे सड़ गए है,
के यक़ीन नही होता
कभी इंसान के रहे होंगे
और ज़ुबान ज़हरीली..
आओ अब कुछ बच्चों की 
मौत पर सोग मानते हैं 

और अपने बचे टुकड़े 
थाल में सजा ले!
ताकि किसी को शक ना हो 
के हमें दर्द हुआ था




Thursday, August 10, 2017

कनुप्रिया को याद करते हुए...

मैं वही कविता हूँ , 
जो अटक गयी है
तुम्हारी, सासों में, हड्डियों में, मेरे सखा 

जब भींच लिया था 
तुमने मुझे कसकर ,
कुछ निशान मेरे आत्मा पर पड़े थे तुम्हारे

जैसे ही कहूँगी तुम्हें साँवरे 
मेरे शब्द भक्ति रस में डूब जाएँगे
कविता की आरती ना  हो जाएगी !

तुम कभी ना थे भगवान 
ना मेरे लिए.. ना उस रात के लिए
जब मेरे बदन पर लिखी थी तुमने ये कविता

ये कैसा शब्दों का तानाबाना,
जब जानती हूँ के तुम मेरे  नहि
ना मैं ही हूँ तुम्हारी

मोह के इस धागे का
रंग श्याम है या नीला 
जिसे बुनते, तुमने पुकारा था मुझे, सखी!


किसी बंधन के बिना
जो बाँध ले बाहों में 
क्या उसिको कहते हैं, साँवरे !

तो चलो, अब उसी वृक्ष के नीचे
जहाँ कभी वंशी के गूँजे थे सुर
दोनो को हथेलियों की रेखा,
 देखते है जोड़कर..
क्या आधा चाँद बना लेंगे.. 
हमारे हिस्से में उतना ही दान है
मेरे सखा..