Friday, February 20, 2015

Lal salam...on a black day

आज शस्त्र उनके हाथ में हैं...
जो छोटी छोटी बातों पर बिदका करते थे,
जो अपनी खामियों को मानते थे महानता
जो डर जाते थे बात बात पर,
के नष्ट न हो जाये उनकी सदियों पुरानी दास्ताँ!
संस्कृति उनकी रही हमेशा नरभक्षकों की.
इससे नहीं पड़ता फर्क ,
के वस्त्र थे उनके हरे या गेरुआ,
वो तो बस व्यस्त रहे, गिनने में छींटे लाल..
बस करते रहे खून, बहाते रहे खून,
डरपोक थे!
ये वहीं लोग हैं, जिनका अस्तित्व टिका हैं
किसी और के आसुओ पे, किसी और और के खून पे..
जो नहीं जानते बढ़ना आगे,
पीछे की तरफ़ ले जाते हैं इंसानियत की कहानी,
वापस उसी बर्बरता के युग में...जो डरपोक ही था.

आज उनके हाथ में शस्त्र हैं
जो डरपोक थे,
डरपोक थे , के सामने आने से डरते थे
डरते थे बदलाव से, जो उतनाही है निश्चित,
जितनी जिंदगी, हर धड़कन, हर पल में.
जो न समझ पाये अर्थ इंसानी संस्कृति का,
लगे रहे उसकी रक्षा में,
करते रहे हमला विचारों पर, बिना समझे बहाते रहे खून
के क़त्ल करके सारी कौम सोचनेवालोंकी,
सोच नहीं मरती!
पर क्या करें वो बुजदिल अनजान हैं...
और आज शस्त्र उनके हाथ में हैं.

©®rasika agashe

Wednesday, January 14, 2015

आपण आणि आपली तत्वं
याचं कुंपण घालून घेतलं न एकदा व्यवस्थित
की मग नाही वाटत एकटं
सरत जातात वर्षामागून वर्षे
टिकटिकत राहतो काटा...
आपल्याबरोबरीचे काही मागे पडतात, काही निघून जातात पुढे...
पण ते तसे असतातच की नेहमीच...
आपल्या आयुष्याच्या शर्यतीत आपण कायम मधोमध!
आपल्या आयुष्यातले आपणच तर असतो गणपती गुळाचे!
आपल्या आयुष्यात स्वतःच्या,
आपणच असतो की महत्वाचे,
की तत्वे आपली, 
चार भली चार बुरी,
यावरच तर ठरत की 
कुंपणात एकटे आहोत आपण
की कुंपणाची ही साथ आहे. 

Tuesday, December 2, 2014

डर नहीं पर अँधेरा सा आता दिखता है,
और सहमीसी आँखे मेरे बच्चे की,
ये कौन से समय में जी रहे हैं हम,
जहाँ दस्तरख्वान सजा है कोक और बर्गरोंसे
पर आती रहती है उनमें से खुशबु,
सिर्फ बारूदों की और खून की
गहनो से लदे पड़े है हम,
पर उन पर भी जमीं है जैसे काई,
या राख काली काली
उड़कर जो आता है इराक, अफगानिस्तान पाकिस्तान से भी.
जिस जमीं पर कभी खेल है घर घर!
वो कभी हरी तो कभी गेरुआ बन जाती है,
बच्चों की किलकारियां भी
हवस की शिकार होती है,
लहू का आखरी बूँद
शरीर में बन जाता है पारा
और हाथ में आने से पहले ही
अपनी पहचान खो जाती है.
डर नहीं है फिर भी...
बास अँधेरा सा दिखता है
...मेरे बच्चे की आँखे सहमी सी है
© RASIKA AGASHE

Tuesday, September 2, 2014

हम दोनों 
ऐसे युग में रहते हैं
जिसकी गति हमारी सबकी गति से ज़्यादा है.
हमने भी प्यार किया
सदियोंसे चला आ रहा पाक़ प्रेम
पर हमारे साथ नहीं गूंजा हंसो का कलरव
न ही तुम्हे मुझमे एलोरा का सौंदर्य दिखा!
उत्तमपुरुष के नाप से मैंने भी कभी नापा नहीं तुम्हे.
 फिर भी हमने प्यार किया!
एक ऐसे युग में,
जहाँ हर चीज़ का मापदंड है, दूरी!
हम कितने दूर हैं.
दुनिया के तमाम लोग,जो प्यार करते हैं, किसी न किसी से
दूर हैं एक दूसरे से
इस तंत्र के महान युग में
जहाँ दुनिया छोटी होती जाती है, 
दिन ब दिन
हम तरसते रहते हैं
चिड़ियों की तरह घोंसला बनाने के लिए,
एक दूसरों पर भरोसा करने के लिए,
ये सुनने के लिए, के रिश्तों में तबादले नहीं होते
हम दोनों ऐसे युग में रहते हैं,
ये वाकई सच है!
©rasika agashe



Wednesday, August 13, 2014

मेरी आँखे खुली है
और नज़र साफ़
पर सबकुछ धुंधला दीखता है
रास्ते दूर तक फैले हुए
मंज़िल का एहसास भी है
पर धुंध बढाती जा रही
और अचानक ये महसूस होता है
ये धुंध नहीं है
भीड़ है
भयानक भीड़, बच्चोंकी
जो आ रहे हैं मेरी तरफ
कमर झुकाये, ग़र्दन टेढ़ी
खानेपीने का पता नहीं
पतली सींख से उनके शरीर
ये हे भविष्य
मेरा, हम सब का!
मेरी आँखे, अब भी खुली हुई
पर धुंध से थोड़ी गीली
ये आंसू पोछने के लिए
किससे कहूँ
हमारा भविष्य तो मुरझायासा
हमारी तरफ बढ़ रहा है!

Friday, July 11, 2014

कैसी अजीब सी रातें आती हैं

कैसी अजीब सी रातें आती हैं
जब लगता है नया दिन आएगा ही नहीं!
नहीं होना ख़ुद का इस दुनिया में,
ये तो ख़याल ए आम है ज़िन्दगी में.
पर इस दुनिया की ही ज़िन्दगी नहीं होगी कल
ये सोचना ख़ौफ़नाक फिर भी जायज़ है
ये साल, और पिछले कई साल ऐसे बीते
जहाँ लोगों ने महीने दर महीने ज़िन्दगी काटी
और अब औरतें गाज़ा की, तय करतीं सफर
ज़िन्दगी शायद कुछ घंटो की मानकर
और हम खुशगवार, मना रहें है ग़म का ख़त्म होना
मन ही मन करते इंतज़ार, सब कुछ ख़त्म होने का
महंगाई, भ्रष्टाचार, हिंसाचार, आरोप-प्रत्यारोप,
किसी क़ौम के, राज्य के, राष्ट्र के नागरिक होने का,
इंतज़ार रात ख़त्म होने का
...कैसी अजीब सी रातें आती हैं
©raskin 

Sunday, July 6, 2014

सब ऐसा ही चलता रहा तो...
हम कहाँ जा पहुचेंगे!
हम जो अपने आप को कहलाते ही
लोग ! इन्सान! और न जाने क्या क्या
कहाँ निकल पडे है हम
वैसे कहाँ के लिये चल पड़े  है हम
रास्ता...और ये अनगिनत सितारे..
खोज रहे हैं बेतरतीब से
पता नही क्या!
पेडो कि पत्तीयाँ गिरती रहती हैं ,
असमय
असमय हि सबकुछ पानी के तांडव में
डूबता नजर आता है
असमय!
ये शब्द हमारे समयो का है बस
वर्ना.. गहारते काले बदल, टुटती पहाड़ियाँ,
छोटे छोटे बच्चों कि असमय मृत्यू
के बावजुद..क्या हमारा चलना जरी राहता
...और ये सब ऐसा हि चलता रहा तो
...हम कहीं पहुचेंगे भी!