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Thursday, January 19, 2017

रुक जा.. थोड़ी थम जा
हवा को साँस तो लेने दे पगली!
के दम ना घुट जाए,
इस सपनों की बारिश में.
कुछ पल ऐसे भी
जब पल रुक जाए
जब हाथ से हाथ ना छूटे
जब पहेली ना बुझे
दूजी पहली से,
जब ठहर जाए ये
सारी कायनात,
जब ज़ुबान पर जूनून हो,
सच ना उतरे...

थोड़ी तो रुक जा
अभी तो घटा ने
कुछ कहा ही नहीं
अभी तो तेरे दिल ने
कुछ सुना ही नहीं!
ये आवाज़ें जो आती है,
जो जाती है
दिल के आरपार,
तेरे पलकों  ने
इन्हें छुआ ही नहीं.
तुझे बड़ी जल्दी पड़ी है!
कुछ तय करने करने की.
अभी तो साये ने
अपनी कोख ढूँढी ही नहीं

रुक जा, थोड़ी थम जा
यह सारा घूँट बेचैनी का
ऐसे पी मत जा पगली,
अभी तो हवा ने साँस ली ही नहीं!
©rasika agashe

Friday, October 7, 2016

इस ख़ामोशी की वजह
मैं जान कर न जान पाती हूँ..
जब जलते हुए मकानमें
कुछ परिंदे झुलस रहे हैं
जब साफ़ सुनाई पड़ रही
बच्चों की चीख पुकार
जब सिर्फ धुआं धुआं
रोया रोया आसमान
कोसो दूर से, बम की आवाज़ नगाड़े सी आती है...
और  पेलेट गोलियों की शहनाइसी शायद ..
लोगों के अंतिम हुंकार
विजय स्तोत्र  बन जाते  हैं..
और हम ख़ामोशी में
युद्ध गीत गाते हैं..
ऐ दोस्त...सरहद पर मिलते हैं आज...



Tuesday, August 30, 2016

तेरी मेरी बातें  अब कहीं नहीं
 अब सिर्फ समाज है
तेरे मेरे बीच  और हर तरफ
और हर तरफ छाया है अबूझ सन्नाटा
इतने शोरगुल के बावजूद
जो तना रहता है
जैसे कोई तम्बू शहर में
बीचोबीच
और हम सिर्फ दर्शक, तुम और मैं
इस आपातकाल की घडी में
जब मन करता है के भींच लूँ तुम्हे बाँहों में
तब तुम हाथ नहीं आते
सटे हुए होते हो मुझसे
पर साथ नहीं आते
गहरा काला  समाज
छाया रहता है मेरे और तुम्हारे मन पर
और कविताये निराशावादी

चलो कहीं चल दे..
इस समाज के लिए ही,
 इस समाज से दूर..
जहाँ मेरी तुम्हारी बातें  होंगी...
और गीत होंगे
और शायद सावन भी....
और पथरीले समाज की आँखे पथरीली
करती हुई हमारा पीछा
क्या ढूंढ लेंगी हमे

... फिर वही सब  करेंगे
जो करते आये हैं सदियोंसे
साँसे रोक लेंगे
प्रदूषित हवासे
न छुएंगे फूलोंकी क्यारियाँ
जो हमारी नहीं
  ऐ  मेरे दोस्त। ..
हो सके तो गाएंगे फिर वही इन्किलाबी गीत
तेरी मेरी बाते
कभी और कर लेंगे

Thursday, August 13, 2015


चाँद का महकता टुकड़ा चोच में रख कर
वो बड़ी दूर से आया था
किसी दरवेश ने उसे बताया था 
के है सात समंदर पर
एक खुला आसमान
जहाँ चमकेगा 
ये चाँद का महकता टुकड़ा 
सुने आकाश की सुनी कोख में रख कर टुकड़ा
वो करता रहा  इंतज़ार
के अब और अब आएगी लौ
और रोशनी से भर जायेगा जहाँ...
सदियाँ बीती
पर अँधेरा कम न हुआ
बस कुछ कोपले फूटी है
महकते चाँद के टुकड़े को
अँधेरे में ही
वो वैसा ही बैठा है 
सुनी कोख लिए..
कौन बताये उसे के
चाँद को करने रोशन
खुद सूरज बन जलना होगा..
महकते अँधेरे
तेरे मेरे ज़िन्दगी के तो कायम है ही...

©Rasika 

Wednesday, May 6, 2015

इंसानी मौत के सस्ते होने में हम सब का हाथ है
शोर...तेज़....मीडिया
तेज़ चलती गाड़ियां
..कुछ शराबी कुछ कुछ बेहोश
कुछ होशवाले खो बैठे हैं होश
आया है बस मौत को जोश
...इस में हम सब का हाथ है

हम नहीं लड़े किसी के लिए
न उठाई आवाज़
घर पर बैठे देखे तमाशे,
मौत का भी तमाशा हो गया आज
अब मत पुचकारो
...इस में हम सब का हाथ है..

हम नहीं थे पहिये के पीछे
न हम मौजूद अदालत में
टीवी स्क्रीन पर चिल्लाने वाले भी हम न थे
हम तो मौन थे..मौन है
जब लोग रस्ते पे ज़िन्दगी बसर करने पर मजबूर...
हम सोशल मीडिया पर कोरी कविता लिख सकते हैं..
हम सब के हाथ लाल हैं..
मौत के सस्ते होने में हम सबका हाथ है..